Pitar Pakh 2024 in Chattisgarh : पितर बईठकी से लेकर पितर खेदा तक… "पितर पाख" में क्या होता है छत्तीसगढ़ में आइये जानें

Pitar Pakh 2024 in Chattisgarh : पितर बईठकी से लेकर पितर खेदा तक… "पितर पाख" में क्या होता है छत्तीसगढ़ में आइये जानें

Pitar Pakh 2024 in Chattisgarh :   छत्तीसगढ़ में प्रत्येक त्यौहार और परम्पराएं सबसे हटकर और विशेष तरीके से मनाई-निभाई जाती है और इनमे से ही एक है पितर पाख. छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष को पितर पाख कहा जाता है. इस पाख के शुरुआत दिन को जहाँ पितर बईठकी के नाम से सम्बोधित किया जाता है, वही अंतिम दिन विसर्जन को पितर खेदा कहा जाता है. छत्तीसगढ़ में बईठकी का मतलब बैठना वहीँ खेदा का मतलब विसर्जन होता है. 

पितरों को समर्पित यह त्योहार क्वांर या आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है, जो पूरे पंद्रह दिनों का होता है और इसलिए इसे ‘पितर पाख’ के नाम से जाना जाता है। ऐसे में यदि पिता के शरीर के त्याग की तिथि श्राद्ध के लिए निश्चित भी हो तो पंद्रह दिनों तक सभी अज्ञात पितरों की पूजा की जाती है.  

पहले दिन को पितर बईठकी कहा जाता है

हिंदू पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष 17 सितंबर से आरंभ हो रहा है, लेकिन इस दिन श्राद्ध नहीं किया जाएगा। इस दिन को पितर बईठकी कहा जाता है. 17 सितंबर यानी मंगलवार को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध है और पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म के कार्य प्रतिपदा तिथि से किए जाते हैं। इसलिए 17 सितंबर को ऋषियों के नाम से तर्पण किया जाएगा। साथ ही जो लोग पूर्णिमा के दिन देह त्यागते हैं उनका श्राद्ध कर्म भी इस दिन किया जाता है. दरअसल, श्राद्ध पक्ष का आरंभ प्रतिपदा तिथि से होता है। इसलिए 18 सितंबर से पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, तर्पण, दान आदि कार्य किए जाएंगे। ऐसे में देखा जाए तो पितृ पक्ष का आरंभ 18 सितंबर से हो रहा है और यह 2 अक्तूबर तक चलेगा। 

नवमी तिथि को महतारी तिथि

नवमी तिथि को महतारी तिथि के नाम से भी जाना जाता है. वैसे तो पितृपक्ष के दौरान सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है, लेकिन हिन्दू पुराणों में पितृपक्ष की नवमी तिथि का एक विशेष महत्व है। इस तिथि को माताओं,बहनों और मृत बेटियों का श्राद्ध करना शुभ माना जाता है।  महतारी तिथि या  मातृनवमी 25 सितम्बर को मनाई जाएगी। पितृपक्ष की नवमी तिथि 25 सितम्बर को दोपहर 12 बजकर 10 से शुरू होकर अगले दिन 26 सितम्बर को 12 बजकर 25 मिनट पर समाप्त होगी।


मातृ नवमी का महत्व

हिन्दू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके। पितृपक्ष की नवमी तिथि महिला पितरों को समर्पित माना जाता है। मातृ नवमी को यदि कोई अपने मृत माता,बहन या बेटी का श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करता है तो उसे शुभ फलदायी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस तिथि को घर की कोई महिला यदि महिला पूर्वजों के निमित पूजा करती है या अन्न-जल दान करती है तो घर घर की सुख-समृद्धि बढ़ती है। मातृ नवमी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर महिला पितरों का श्राद्ध करें। श्राद्ध करते समय इस बात का ध्यान रखें की मुख दक्षिण दिशा कि ओर हो। श्राद्ध के समय महिला पितरों की फोटो भी अवश्य रखें। श्राद्ध करते समय फोटो पर फूल-माला चढ़ाएं और काले तिल के तेल का दीपक भी जलाएं। दीपक जलाने के बाद पितरों को तुलसी पत्ता और गंगाजल भी अर्पित करें। इस दिन श्राद्ध सम्पन्न होने के बाद भागवत गीता का पाठ भी जरूर करें। पाठ हो जाने के बाद पितरों को भोजन परोसें और भोग लगाने के बाद उस भोजन कौआ,चींटी या गाय को खिला दें।

अमावस्या के दिन “सर्व पितृ मोक्ष” या पितर खेदा 

अमावस्या के दिन  “सर्व पितृ मोक्ष” श्राद्ध किया जाता है। अमावस्या के दिन किसी अज्ञात या भूले हुए पूर्वज को श्राद्ध करने का प्रावधान है. यदि कोई व्यक्ति अपने पिता को भूल जाता है। इस तरह कुल के सभी पूर्वजों का श्राद्ध होता है। इसी वजह से इस अमावस्या को सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है और हमारे छत्तीसगढ़ी में इसे “पितर खेदा” भी कहा जाता है।

क्या-क्या करते हैं छत्तीसगढ़ में 

मान्यता है कि पूर्वज पंद्रह दिन हमारे साथ घर में रहते थे। उनके स्वागत के लिए पितर पाख के पहले ही घर की साफ-सफाई हो जाती है. पूरे पंद्रह दिन देहरी से लेकर ओरवाती तक घर की महिलाएं गोबर से लीपाई करती हैं, साथ ही चावल आटे से ही चौक बनाती है. कई समाज में घर के बाहर बनाये गए चौक के ऊपर लकड़ी का पाटा रखकर उसके ऊपर पानी का लोटा, दातुन, और फूल रखा जाता है. आइये जानें क्या-क्या करते हैं छत्तीसगढ़िया 

  • – पूरे पक्ष घर में लहसुन, प्याज वर्जित होता है. 
  • – पितर पाख में तरोई  और उड़द दाल का बहुत महत्व होता है. प्रत्येक दिन और विशेष तिथियों पर उड़द के सिंपल बड़े पितरों के लिए बनाये जाते हैं, वहीँ बिना लहसुन प्याज के तरोई की सब्जी या सिर्फ तरोई तल के निकाला जाता है. 
  • –  इस पक्ष में घर में कढ़ी के साथ ही किसी भी सब्जी में  सरसो-मेथी से फ़ोरन नहीं दिया जाता है. तवे पर अंगाकर रोटी नहीं बनाई जाती है. जिमीकंद, मूली, मसूर की सब्जी भी नहीं बनाई जाती है. 
  • – पितरों को गुड़-घी का हुम देने के बाद बिना नमक के पूरी-बड़े और तला हुआ तरोई का भी हुम दिया जाता है.
  • – तर्पण के लिए जिस कुश का उपयोग किया जाता है उसे तरोई के पत्ते पर ही आसन देकर रखा जाता है. इसके साथ ही तर्पण की हर विधि तरोई पत्ते में ही की जाती है. .
  • – इस पक्ष के दौरान घर की महिलाएं नया कपडा, चूड़ी या कोई भी नया समान लेती है न पहनती है. यहाँ तक कई घरों में आज भी बाल धोकर नहाया नहीं जाता न कंघी की जाती है.
  • – इस पक्ष में घर के पुरुष वर्ग दाढ़ी-बाल नहीं बनवाते हैं और जब तक जरूरी न हो जो पितृ उपासक है वो घर-शहर से बाहर नहीं जाते हैं,  क्योंकि उन्हें रोज एक ही वक्त पर जो टाइम चुना जाता है उस टाइम पर तालाब-नदी या फिर घर पर तर्पण के कार्य को संपन्न करना होता है. पूर्वजों के उपासक अपने हाथों में कुश, दूबी और तिल लिए सूर्य देव को प्रणाम करते हैं और अंजरी में जल भरकर अपने पितरों की पूजा करते हैं और उनके उद्धार की प्रार्थना करते हैं।
  • – इस पक्ष में किसी भी प्रकार के नए सामान की खरीदारी, शुभ बातचीत, विशेष कार्य और  मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है. 
  • – पितरों के लिए विशेष रूप से खीर, पूरी-बड़ा, दही बड़ा, बबरा  जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं.
  • – पितर की विशेष तिथियों पर खास पितर की निमित में किसी ब्राम्हण को सम्मान के साथ बुलाकर खाना खिलाकर दान दिया जाता है या फिर ब्राम्हण के घर दान दिया जाता है. 
  • – महतारी नवमीं को विशेष कर सुहागिन औरतों को बुलाकर खाना खिलाया जाता है और सुहाग की चीजे दी जाती है. 
  • – इस पूरे पक्ष में कौआ का विशेष महत्व होता है. घर की छत या छानही पर पितरों के नाम से कौआ के लिए खाने की चीजे रखी जाती है. इस पक्ष में कौआ का दिखना भी शुभ माना जाता है. 

श्राद्ध की सभी मुख्य तिथियां



  • 17 सितंबर मंगलवार पूर्णिमा का श्राद्ध (ऋषियों के नाम से तर्पण)
  • 18 सितंबर बुधवार प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध (पितृपक्ष आरंभ)
  • 19 सितंबर गुरुवार द्वितीया तिथि का श्राद्ध
  • 20 सितंबर शुक्रवार तृतीया तिथि का श्राद्ध
  • 21 सितंबर शनिवार चतुर्थी तिथि का श्राद्ध
  • 22 सितंबर शनिवार पंचमी तिथि का श्राद्ध
  • 23 सितंबर सोमवार षष्ठी और सप्तमी तिथि का श्राद्ध
  • 24 सितंबर मंगलवार अष्टमी तिथि का श्राद्ध
  • 25 सितंबर बुधवार नवमी तिथि का श्राद्ध
  • 26 सितंबर गुरुवार दशमी तिथि का श्राद्ध
  • 27 सितंबर शुक्रवार एकादशी तिथि का श्राद्ध
  • 29 सितंबर रविवार द्वादशी तिथि का श्राद्ध
  • 30 सितंबर सोमवार त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध
  • 1 अक्टूबर मंगलवार चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध
  • 2 अक्टूबर बुधवार सर्व पितृ अमावस्या (समापन)

श्राद्ध करने का सबसे उत्तम समय

शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में सुबह और शाम के समय देवी देवताओं की पूजा को शुभ बताया गया है। साथ ही पितरों की पूजा के लिए दोपहर का समय होता है। वहीं पितरों की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय 11.30 से 12.30 बजे तक बताया गया है।

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