Chhattisgarh Tarkash 2025: चाल, चरित्र और लाल बत्ती

तरकश, 6 अप्रैल 2025
संजय के. दीक्षित
चाल, चरित्र और लाल बत्ती
आखिरकार, सत्ताधारी पार्टी के 36 नेताओं को निगम-मंडलों में पोस्टिंग मिल गई। इनमें जमीन की दलाली और चापलूसी के लिए ख्यात कुछ गुरूघंटाल अच्छी पोस्टिंग पाने में कामयाब हो गए। बावजूद इसके पार्टी ने चाल-चलन और चरित्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। सरकार बनने के बाद छह महीने तक जिन नेताओं ने मौके का फायदा उठाकर जमकर तोड़ी की, पार्टी ने उन्हें लाल बत्ती से आंखें फेर लिया। शौकीन मिजाजी को लेकर चर्चित कुछ नेताओं को झटका देकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई है। लाल बत्ती के लिए सरकार और संगठन ने जो पैरामीटर सेट किया था, उनमें पार्टी के लिए परिश्रम के साथ छबि और आचरण मुख्य था। यही वजह रही कि काली कमाई वाले कुछ कारोबारी नेता अटैची लेकर घूमते रहे…मगर उनकी दाल नहीं गल पाई।
एक निगम, दो पार्टनर
रमन सरकार की तीसरी पारी में बीजेपी नेता छगन मूंदड़ा सीएसआईडीसी के चेयरमैन रहे। कांग्रेस गवर्नमेंट में यह पद खाली रहा। सरकार ने इसमें पोस्टिंग की जरूरत नहीं समझी। मगर विष्णुदेव सरकार ने राजीव अग्रवाल को सीएसआईडीसी का चेयरमैन बनाया है। राजीव रायपुर बीजेपी के शहर अध्यक्ष रहे हैं। वे छगन मूंदड़ा के बिजनेस पार्टनर हैं। छगन और राजीव ने मिलकर रायपुर रियल इस्टेट कंपनी बनाई थी। चलिये, सीएसआईडीसी में छगन के अनुभवों का लाभ राजीव को मिलेगा। दूसरा, सबसे महत्वपूर्ण यह कि वैश्य समुदाय को अब रंज नहीं रहेगा कि नई सरकार में उन्हें वेटेज नहीं दिया जा रहा।
सबसे बड़ा बोर्ड
ऐसे तो कहा जाए तो साल में 25 हजार करोड़ से अधिक का कारोबार करने वाला मार्केटिंग फेडरेशन याने मार्कफेड छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा बोर्ड (फेडरेशन) होगा। मगर नेताओं की नोटिस में न होने से सबसे अधिक आकर्षण सीएसआईडीसी, क्रेडा, माईनिंग कारपोरेशन, पाठ्य पुस्तक निगम, नागरिक आपूर्ति निगम, ब्रेवरेज कारपोरेशन जैसे बोर्ड-निगमों का रहता है। अलबत्ता, बिना मगजमारी के झोली भरने वाली निगम है तो वह है पाठ्य पुस्तक निगम की। एकदम साफ-सुथरा काम। साल में एक बार 50 लाख पुस्तकों के लिए पेपर और प्रिंटिंग का टेंडर होता है, और गिरे हालत में चार-पांच खोखा का इंतजाम। ब्रेवरेज कारपोरेशन में भी बिना मेहनत का सब कुछ आता है। ब्रेवरेज में प्रबल प्रताप की दावेदारी प्रबल होने के बाद भी पता नहीं वे कैसे चूक गए।
लाल बत्ती के बाद फुल स्टॉप
मोतीलाल वोरा को छोड़ दें तो अविभाजित मध्यप्रदेश और पृथक छत्तीसगढ़ में कोई ऐसा चेहरा नहीं, जो निगम-मंडल अध्यक्ष की कुर्सी के बाद सियासत में शिखर पर जा पाया या नाम कमाया हो। अपवाद के तौर पर मोतीलाल वोरा राज्य परिवहन संघ के अध्यक्ष रहे, उसके बाद मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री तक पहुंचे। उनके अलावा कनक तिवारी हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे और रामानुजलाल यादव माईनिंग कारपोरेशन के। दोनों का सियासी कैरियर इसी के साथ खतम हो गया। छत्तीसगढ़ बनने के बाद 25 सालों में कोई ऐसा निगम-मंडल के अध्यक्ष का नाम आपके ध्यान में नहीं होगा, जो उसके बाद राजनीतिक कैरियर आगे बढ़ा हो। गौरीशंकर अग्रवाल जरूर माईनिंग कारपोरेशन के चेयरमैन रहने के बाद विधानसभा अध्यक्ष बनें। मगर उन्हें अगले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उनका भी सियासी कैरियर अब खतम ही समझिए। छत्तीसगढ़ बनने के बाद चार मुख्यमंत्री बनें और चारों सरकारों में 65 से अधिक मंत्री रहे, मगर किसी का भी बैकग्राउंड निगम और मंडल वाला नहीं रहा। बहरहाल, अभी जिन 36 नेताओं को पोस्टिंग मिली है, उनमें कई अच्छे और बढियां काम करने वाले चेहरे हैं, उन्हें किसी अच्छे पंडित से ‘ग्रह-दशा’ ठीक करा लेनी चाहिए। नहीं हो तो अटल श्रीवास्तव से मशिवरा कर लें। अपवादस्वरूप पर्यटन बोर्ड के चेयरमैन रहने के बाद वे विधायक बनने में कामयाब रहे, वो भी मोदी गांरटी की लहर में।
हाईटेक लोक सुराज
लोक सुराज अभियान को इस बार गुड गवर्नेंस से जोड़ा जा रहा है। नाम भी रखा गया है सुशासन तिहार। इस बार शिकायत नहीं, सरकार समाधान पर जोर दे रही है। इसलिए शिकायत पेटी नहीं, समाधान पेटी और समाधान शिविर की बातें हो रही। इस बार टेक्नॉलॉजी का भरपूर इस्तेमाल किया जाएगा। शिकायतों के लिए पंचायत मुख्यालयों में समाधान पेटी रखी जाएगी, तो लोग चलते-फिरते मोबाइल से भी अपने प्राब्लम पोर्टल पर दर्ज कर सकेंगे। साफ्टवेयर ऐसा तैयार किया जा रहा कि मोबाइल नंबर टाईप कर आवेदन की स्थिति का पता चल जाएगा। किस जिले में कितने आवेदन आए और उसका कैसे निबटारा हुआ…सीएम सचिवालय से इसकी सत्त मानिटरिंग की व्यवस्था बनाई जा रही है। पूरा सीएम सचिवालय पखवाड़े भर से इस काम में जुटा हुआ है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और प्रभारी सचिवों का महीने भर का दौरा कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है।
ईओडब्लू जांच और ब्रेकर!
छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव सरकार शुरू से गुड गवर्नेंस को प्रायरिटी दे रही है। जाहिर है, सरकार बनते ही मंत्रियों को आईआईएम में क्लास कराई गई थी। सुशासन की दिशा में सरकार ने कई फैसले भी किए हैं। मुख्यमंत्री ने कई मौकों पर कहा है…करप्शन में किसी को बख्शा नहीं जाएगा। अभनपुर भारतमाला परियोजना में 324 करोड़ के घोटाले में उन्होंने ईओडब्लू जांच का ऐलान करने में देर नहीं लगाई। मगर यह भी सही है कि सिस्टम में बैठे कुछ लोग सरकार के गुड गवर्नेंस लाने की कोशिशों में रोड़े अटका रहे हैं। आलम यह है कि अभनपुर मुआवजा घोटाले की जांच की 12 मार्च को घोषणा हुई और उसकी नोटशीट सामान्य प्रशासन विभाग की फाइलों की ढेर से बाहर निकल नहीं पा रही है। सिस्टम को गुड गवर्नेंस के ऐसे ‘ब्रेकरों ‘ पर नजर रखनी चाहिए।
कलेक्टरों का ट्रांसफर
सुशासन तिहार से पहले कलेक्टरों के ट्रांफसर की चर्चाएं बड़ी गर्म है। पिछले बुधवार को लिस्ट निकलने की अटकलें ब्यूरोक्रेसी में बड़ी तेज थी। हालांकि, सस्पेंस इस पर भी है कि लोक सुराज से पहले ट्रांसफर होंगे या बाद में। इसमें ताजा अपडेट है…लोक सुराज से पहले कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी। अमित शाह के दौरे के बाद इस पर मंत्रणा होगी कि किन-किन जिलों में बदलाव किया जाए। वैसे लिस्ट बहुत बड़ी नहीं होगी। पांच-सात जिले इसकी चपेट में आ सकते हैं। 8 अप्रैल से सुशासन तिहार शुरू होने वाला है। ऐसे में लगता है कि दो-एक दिन में सरकार को इस पर फैसला लेना होगा।
नए सीआईसी और परसेप्शन
मुख्य सूचना आयुक्त का इंटरव्यू देने चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन और निर्वतमान डीजीपी अशोक जुनेजा एक साथ हंसते-मुस्कराते सर्किट हाउस पहुंचे थे…उसको लेकर प्रशासनिक हल्को में तरह-तरह की बातें हो रही हैं। लोग जुनेजा को लेकर दावे कर रहे हैं…वे ऐसे ही दिल्ली से फ्लाइट पकड़कर सीआईसी का इंटरव्यू देने थोड़े आए होंगे। मगर सवाल है, जुनेजा अगर सीआईसी तो फिर चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन का क्या? अमिताभ को लोग बिजली कंपनियों का चेयरमैन बना दे रहे हैं। दलील भी कि एसके मिश्रा और शिवराज सिंह सीएस से रिटायरमेंट के बाद इस पद को संभाल चुके हैं। मगर ये बातें हैं…बातें का क्या। फैसला मुख्यमंत्री को लेना है। कई बार परसेप्शन कुछ और बनता है और होता कुछ और है।
चीफ सिकरेट्री की विदाई
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के ढाई दशक में 11 मुख्य सचिव हुए हैं। अमिताभ जैन 12वें हैं। इन 11 में से आठ की विदाई सामान्य रही। सुनिल कुमार के लिए तो कैबिनेट की बैठक बुलाई गई थी। मगर तीन मुख्य सचिवों की किस्मत वैसी नहीं रही। एक तरह से कहें तो बेआबरु होकर तेरे कूचे…सरीखी स्थिति रही। पी. जॉय उम्मेन को रमन सिंह सरकार ने हटाया तो खफा होकर उन्होंने वीआरएस ले लिया। यद्यपि, सरकार ने उन्हें सरकारी बिजली कंपनी का चेयरमैन पद पर कंटिन्यू करने का ऑफर दिया था। मगर छुट्टी में रहने के दौरान हटा देना उन्हें अपमानजनक लगा और केरल से ही वीआरएस के लिए अप्लाई कर दिया। उनसे पहले आरपी बगाई से भी राज्य सरकार के रिश्ते अत्यधिक खराब हो गए थे। चूकि उनका कार्यकाल कम बचा था, इसलिए उन्हें हटाया नहीं गया मगर पुराने लोगों को याद होगा कि नक्सल सलाहकार केपीएस गिल को लेकर चीफ सिकरेट्री और सरकार के बीच कैसी खटास आ गई थी। दरअसल, केपीएस गिल को बगाई के सुझाव पर सरकार ने एडवाइजर बनाया था मगर गिल के शाही शौक और नित नए डिमांड से सरकार आजिज आ गई थी। उपर से केपीएस के पक्ष में बगाई की वकालत। इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार और सीएस के बीच रिश्ते काफी तल्ख हो गए थे। सरकार के तेवर भांप आईएएस एसोसियेशन की बगाई की विदाई देने की हिम्मत नहीं पड़ी। इसके बाद तीसरा नंबर विवेक ढांड का रहा। हालांकि, उनका मामला सार्वजनिक नहीं हो पाया। ढांड का रेरा चेयरमैन में सलेक्शन हो चुका था। समझा जा रहा था कि रिटायर होने के बाद वे नई जिम्मेदारी संभालेंगे। सरकार और उनके रिश्ते में दूरियां तब सामने आई, जब रमन सिंह और उनकी टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे से यकबयक ढांड का नाम कट गया। उसके बाद एक रोज अचानक खबर आ गई कि ढांड ने वीआरएस लिया और अजय सिंह को नया मुख्य सचिव बनाया गया। जाहिर है, सीएस के तौर पर ढांड का अंतिम समय अच्छा नहीं रहा। इस मामले में अपने अमिताभ जैन का जवाब नहीं। पिछली सरकार ने सीएस बनाया। सरकार बदली…पांचवा साल चल रहा, मगर ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर। सबसे अधिक समय तक सीएस की कुर्सी पर रहने का कीर्तिमान बनाने के बाद भी अमिताभ जैन सभी के लिए कंफर्ट…सभी के लिए ठीक रहे।
सीएस और डीजीपी की छुट्टी
छत्तीसगढ के 25 बरसों में सिर्फ तीन बार सरकार बदली है। पहली बार 2003 में। फिर 2018 और 2023 में। 2003 में अजीत जोगी सरकार बदली तो एसके मिश्रा चीफ सिकरेट्री थे। रमन सरकार ने उन्हें रिटायर होते तक कंटिन्यू ही नहीं किया, बल्कि बाद में सीएसईबी चेयरमैन की पोस्टिंग भी दी। 2018 में जब कांग्रेस सरकार बनी तो अजय सिंह मुख्य सचिव थे। अजय को महीने भर में हटा दिया गया। उनकी जगह सुनील कुजूर को नया सीएस बनाया गया। 2023 में जब सरकार बदली तो अमिताभ जैन चीफ सिकरेट्री थे, वे अभी भी कंटिन्यू कर रहे हैं। पोस्टिंग के मामले में बेहद किस्मती रहे अजय सिंह का चीफ सिकरेट्री के तौर पर हार्ड लक रहा। सरकार बदलने पर हटाए जाने वाले एकमात्र सीएस के रूप में उनका नाम दर्ज हो गया। रही बात डीजीपी की तो सरकार बदलने के बाद डीजीपी हमेशा टारगेट पर रहे, सिर्फ अशोक जुनेजा को छोड़। 2003 में बीजेपी की सरकार बनने के थोड़े दिन बाद ही अशोक दरबार को बदल दिया गया। 2018 में एएन उपध्याय को सरकार गठित होने के 24 घंटे के भीतर हटाया गया। सिर्फ जुनेजा ऐसे आईपीएस रहे, जो रमन सिंह सरकार में खुफिया चीफ रहने के बाद भी कांग्रेस सरकार में डीजीपी बने और फिर बीजेपी सरकार में अपना कार्यकाल कंप्लीट किया।
अंत में दो सवाल आपसे
1. क्या छत्तीसगढ़ के अगले चीफ सिकरेट्री अमित अग्रवाल होंगे?
2. बोर्ड-निगमों की पोस्टिंग में रायपुर जिले को सबसे अधिक जगह मिलने के बाद क्या नए मंत्रियों में रायपुर की संभावना खतम समझा जाए?