Chhattisgarh News: कुर्सी तो मिलेगी पर, भाजपा जिलाध्यक्षों का घट जाएगा रुतबा… जानिए कैसे?

Chhattisgarh News: कुर्सी तो मिलेगी पर, भाजपा जिलाध्यक्षों का घट जाएगा रुतबा… जानिए कैसे?

Chhattisgarh News: बिलासपुर। एक दशक बाद बिलासपुर जिला भाजपा में एक बार फिर नया प्रयोग हुआ है। एक दशक पहले शहर अध्यक्ष की कुर्सी खत्म कर दी गई थी। शहर को छह मंडलों में बांट दिया गया था। शहर अध्यक्ष के रूप में एक क्षत्रप के बजाय मंडल अध्यक्षों के रूप में छह क्षत्रप तैनात कर दिया गया था। राजनीतिक और सांगठनिक नजरिए से देखें तो सीधेतौर संगठनकर्ताओं ने चतुराई दिखाते हुए सत्ता का विकेंद्रीकरण कर दिया था। लाभ हुआ या नहीं यह तो मनन और चिंतन का विषय है, पर जो बातें सामने आई इससे तो यही दिखा कि क्षेत्रपों के बीच गुटीय वर्चस्व ज्यादा ही नजर आया।

बहरहाल जिला भाजपा में एक और नया प्रयोग हुआ है। प्रयोग ऐसा कि इस बार संगठन के नजरिए से प्रदेश भाजपा के रणनीतिकारों और जिले के दिग्गजों ने जिले का विभाजन कर दिया है। इसी जिले में अब दो जिलाध्यक्ष नजर आएंगे। ऐसा इसलिए कि संगठन के नजरिए से बिलासपुर जिला अब दो जिलों में बंट गया है। बिलासपुर, तखतपुर और कोटा को मिलाकर एक संगठन जिला तो बिल्हा,मस्तूरी व बेलतरा को मिलाकर दूसरा संगठन जिला। दो जिले बने तो जाहिर है दो जिलाध्यक्ष भी बनाए जाएंगे। संगठनकर्ताओं के दावों पर नजर डालें तो इससे संगठन के कामकाज में गति आएगी। सामंजस्य बना रहेगा और संपर्क भी सीधेतौर पर रहेगा। संगठन चलाने वालों के नजरिए से सोचें और देखें तो भौगोलिक सीमाएं कम होने से दायरा सिमट जाएगा। विस्तृत पहचान के बजाय एक दायरे तक सिमट कर रह जाना पड़ेगा।

छह विधानसभा के बजाय तीन विधानसभाओं तक अपनी राजनीतिक गतिविधियों को समेट कर रखना होगा। छह के बजाय तीन विधानसभाओं तक पहचान बन पाएगी। जिन तीन विधानसभाओं को अलग कर दिया है वहां के कार्यकर्ताओं से संपर्क तो रहेगा पर काम को लेकर ना अनिवार्यता रहेगी और ना ही बाध्यता। यहां तक कि आप अनुशासन का डंडा भी नहीं लहरा पाएंगे। इस बात की संभावना भी काफी हद तक रहेगी कि राजनीतिक शिष्टाचार भी ना रह पाए। बात जरा विस्तार करें तो तीन विधानसभाओं में सिमटे जिले के जिलाध्यक्ष के दायरे में 14 या फिर 15 मंडल आएंगे। विधानसभा से लेकर नगरीय निकाय और ग्राम पंचायतों की राजनीति करने वाले भी प्रदेश भाजपा द्वारा खींची गई संगठन जिला के दायरे में ही अपनी गतिविधियों को चलाएंगे।

0 इसलिए भी बनेगी पहचान का संकट

एक निश्चित दायरे में सिमटे पार्टी के कार्यकर्ता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने संगठन जिला के पदाधिकारियों के आसपास ही फेरे लगाएंगे। पड़ोसी संगठन जिले से ना तो कोई ताल्लुक ही रखेंगे और ना ही राजनीतिक रूप से फायदा ही होगा। जाहिर है इससे पड़ोसी जिलाध्यक्ष के सामने पहचान का संकट भी खड़ा होगा, भौगोलिक सीमाएं कम होने से अपनी सियासी महत्वाकांक्षा को पूरी करने में वह लाभ नहीं ले पाएंगे जिसका उनको दरकार रहेगा।

0 निश्चित दायरे में सिमटे होने के कारण एक संकट ऐसा भी रहेगा

आमतौर पर यह देखने को मिलता है कि संगठन में रहते-रहते राजनीतिक महत्वाकांक्षा जोर मारने लगती है, फिर टिकट की दावेदारी और दबाव बनाने की राजनीति भी शुरू हो जाती है। राजनीतिक प्रोफाइल बड़ी होने के कारण दावेदारी में भी उसी अंदाज में वजन बढ़ने लगता है। अब जबकि संगठन जिला का दायर सिमट गया तो दावेदारी में वजन भी उसी अंदाज में घटना स्वाभाविक है। छोटे संगठन जिला बनाने के पीछे दावेदारों की संख्या घटना तो नहीं। भीतर ही भीतर अब इस चर्चा ने भी जोर पकड़ना शुरू कर दिया है।

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