दो दशक बाद राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क नए कॉरिडोर से गुजरी बाघिन

दो दशक बाद राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क नए कॉरिडोर से गुजरी बाघिन

देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे पर उत्तराखंड में वन्यजीवों का सबसे बड़ा और पुराना चीला-मोतीचूर कॉरिडोर (गलियारा) करीब दो दशक बाद फिर से गुलजार होने लगा है। हाईवे पर फ्लाईओवर के नीचे इस कॉरिडोर से गुजरते हुए बाघ (टाइगर) कैमरा ट्रैप में कैद हुआ है। वन विभाग वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से इसे काफी अहम मान रहा है।

देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे और रेलवे ट्रैक के कारण राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क पूर्वी और पश्चिमी दो भागों में बंट गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि पार्क के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में वन्यजीवों की आवाजाही बंद हो गई। पार्क के पूर्वी हिस्से में जहां 34 बाघ हैं, वहीं पश्चिमी हिस्से में मात्र दो बाघिन अकेले रह गई थीं।

अब हाईवे पर बने फ्लाईओवरों ने इंसानों के सफर को आरामदायक बनाने के साथ-साथ चीला-मोतीचूर कॉरिडोर को फिर जिंदा कर दिया। इस कॉरिडोर के फिर से गुलजार होने से पूरे वन्यजीव पूरे पार्क में आसानी से आवाजाही कर सकेंगे। बता दें कि वाइल्ड लाइफ के लिए मशहूर राजाजी टाइगर रिजर्व देश का एकमात्र ऐसा टाइगर रिजर्व है, जो चारों ओर से आबादी से घिरा हुआ है।

चीला-मोतीचूर कॉरिडोर को सक्रिय करने के प्रयास दो दशक से भी अधिक समय से चल रहे थे। इसके लिए ऋषिकेश के खांड़ गांव को भी विस्थापित किया गया। इसके बाद हाईवे पर सितंबर 2021 में तीन प्लाई ओवर बनाए गए। इसके नतीजे अब मिलने शुरू हो गए हैं।
वर्ष 2019 के एनएचएआई के एक आकलन के अनुसार, फ्लाईओवर बनने से पहले देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर कॉरिडोर के इस हिस्से में एक दिन में एक लाख 34 हजार गाड़िया गुजरती थीं। ऐसे में यह कॉरिडोर वन्यजीवों के लिए अघोषित तौर पर प्रतिबंधित हो गया था।
चीला-मोतीचूर कॉरिडोर से हाथी, गुलदार और बाघ जैसे लंबे विचरण वाले वन्यजीव हरिद्वार से शिवालिक के जंगल होते हुए कार्बेट की ओर आते-जाते थे। कभी-कभी वन्यजीव नेपाल तक पहुंच जाते थे। लेकिन हाईवे के कारण यह आवाजाही बाधित हो गई थी। हालांकि इसी साल जनवरी में इस गलियारे से हाथियों के गुजरने की तस्वीरें भी कैमरा ट्रैप में कैद हुई थीं।
उत्तराखंड ही नहीं देशभर के वन्यजीव प्रेमियों के लिए यह बेहद खास खबर है। वन विभाग इस उपलब्धि से बेहद खुश है। अब पार्क के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में वन्यजीव आसानी से आवाजाही कर सकेंगे। लेकिन अभी इस कॉरिडोर के एक हिस्से में खांड़ गांव से लगते सेना के कुछ अधिष्ठान हैं, जिन्हें विस्थापित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। – समीर सिन्हा, चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन, वन विभाग, उत्तराखंड

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