सिकरेट्री का एक तुगलकी आदेश, छत्तीसगढ़ के सेठ-साहूकारों को मालामाल कर दिया और आदिवासियों को कंगाल…

सिकरेट्री का एक तुगलकी आदेश, छत्तीसगढ़ के सेठ-साहूकारों को मालामाल कर दिया और आदिवासियों को कंगाल…

रायपुर। सेठ-साहूकारों और बड़े लोगों द्वारा छत्तीसगढ़ के भोले-भाले आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा कर अपना व्यवसाय खड़ा करने का फुलप्रूफ प्लान अगस्त 2016 में बनाया गया। इस संबंध में तत्तकालीन राजस्व सिकरेट्री केआर पिस्दा ने एक आदेश निकाला और उसके बाद लाखों आदिवासियों की जमीनों पर बिना कलेक्टर के परमिशन सेठ-साहूकारों का कब्जा हो गया। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आदिवासियों की जमीन के संबंध में नियमों में ऐसा संशोधन किसी भी राज्य में नहीं हुआ। मगर आदिवासी प्रदेश छत्तीसगढ़ ने आदिवासियों की जमीन हड़पने वाला प्रावधान कर डाला।

दरअसल, आदिवासियों को शोषण से बचाने पूरे देश में उनकी जमीनों के खरीदी-बिक्र्री को प्रतिबंधित किया गया है। वे कलेक्टर की अनुमति से ही जमीन बेच सकते हैं। इसके लिए कलेक्टर के ऑफिस में आदिवासियों को आवेदन देना होता है। कलेक्टर पूरी जांच-पड़ताल के बाद जब अश्वस्त हो जाते हैं कि कोई गड़बड़ी नहीं हो रही, तब बेचने की अनुमति देते हैं। ये नियम इसलिए बनाया गया है कि आदिवासियों को कोई गुमराह करके उनके जमीनों को न हथिया लें।

छत्तीसगढ़ में खेला

छत्तीसगढ़ में खासकर सरगुजा, बस्तर, रायगढ़ तरफ आदिवासियों की बड़े मौके की जमीनें थीं। मगर कलेक्टर की अनुमति का ब्रेकर होने की वजह से सेठ-साहूकार उसे खरीद नहीं पा रहे थे। पावरफुल लोग कलेक्टर की परमिशन ले भी लेते थे मगर उसकी एक लिमिट होती है। एक तो उसमें कलेक्टरों को भी उनका हिस्सा देना पड़ता है, एक कलेक्टर अपने कार्यकाल में सीमित संख्या में ही आदिवासियों को जमीन बेचने की अनुमति दे सकता है। ज्यादा होने पर मामला कहीं फूटा तो हंगामा खडा हो जाएगा। मसलन, रायगढ़ के कुछ कलेक्टरों ने पैसे लेकर बड़ी संख्या में आदिवासी जमीन क्रय-विक्रय की अनुमति दी है।

सचिव का ये आदेश

23 अगस्त 2016 में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राजस्व सचिव केआर पिस्दा ने एक कमिश्नरों और कलेक्टरों को एक आदेश भेजा, जिसमें आदिवासियों के जमीनों को लीज पर देने पर कलेक्टर से अनुमति वाली शर्त उन्होंने हटा लिया। उन्होंने आदेश में लिखा कि आदिवासियों की जमीनों को बेचने पर कलेक्टर की अनुमति लगेगी मगर पट्टा देने पर छूट प्रदान किया जाता है। अगर कोई आदिवासी अपनी जमीन लीज पर देता है तो उसे किसी से भी परमिशन लेने की जरूरत नहीं। उन्होंने उर्जा विभाग के पत्र का संदर्भ देते हुए छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 1656 में संशोधन कर दिया। जबकि, देश के किसी भी राज्य में ऐसा नहीं है। यहां तक कि मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ का मदर स्टेट रहा है। छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के ही नियम-कायदे चलते हैं। मध्यप्रदेश में भी किसी आदिवासी की जमीन को लीज पर नहीं लिया जा सकता। अगर ऐसा हुआ तो वह क्राइम होगा।

कौड़ियों में जमीनों पर कब्जा

राजस्व सचिव केआर पिस्दा के इस आदेश के बाद छत्तीसगढ़ में भूमाफियाओं और सेठ-साहूकारों की लाटरी निकल गई। सरगुजा, बस्तर, रायगढ़ तरफ आदिवासियों के पास मौके की एक भी जमीन नहीं बची है। लोगों ने थोड़े से पैसे देकर छलपूर्वक आदिवासियों से जमीनें लेकर उस पर पेट्रोल पंप, फार्म हाउस से लेकर बिल्डिंगे तान दी है। कई लोगों ने 30 साल से लेकर 50 साल तक की लीज बनवा ली है। आदिवासियों की जमीनों पर एक बार अब पक्का स्ट्रक्चर बन गया तो फिर कहां टूटने वाला है। जानकारों का कहना है कि अवसर देखकर लोग कलेक्टर से परमिशन लेकर भी रजिस्ट्री करा लेंगे।

कई कलेक्टरों ने आंख मूंद लिया

पिछले आठ बरसों में आदिवासियों की जमीनें सेठ-साहूकारों द्वारा हड़पी जाती रही और जिले के कलेक्टर आंख मूंद रहे। जबकि, सभी जिम्मेदार लोगों को पता है कि राजस्व सचिव केआर पिस्दा के आदेश के बाद पूरे प्रदेश में आदिवासियों की जमीनों की लूटपाट की जा रही है। मगर सिस्टम में बैठे न मंत्रियों को इसकी सुध आई और न कलेक्टरों ने अपने स्तर पर कोई प्रयास किया कि इसे रोका जाए। रायगढ़ के एक पूर्व कलेक्टर ने एक कदम आगे जाकर आदिवासियों की जमीन बेचने की 200 से अधिक प्रकरणों की अनुमति दे डाली।

सड़क पर आदिवासी

बड़े लोगों ने चंद पैसे देकर आदिवासियों की बेशकीमती जमीनों पर अपनी इमारते या फर्म हाउस खड़ी ली। कुछ लोग उसे खेत में तब्दील कर लाखों रुपए बटोर रहे हैं। आदिवासियों को जो पैसे मिले, वे अब खतम हो गए। उन आदिवासियों का उन जमीनों पर खेती-बाड़ी कर अपना जीवकोपार्जन चलता था, अब उनके सामने फांकेहाली की स्थिति है। जानकारों का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार अगर आदिवासियों की जमीनों की लीज की जांच करा ले तो अब तक का सबसे बड़ स्कैम सामने आएगा।

कोई मंत्री नहीं

छत्तीसगढ़ की हर सरकार में दो से चार आदिवासी मंत्री रहे हैं। मगर किसी भी मंत्री ने अब तक आदिवासियों के साथ किए जा रहे इस शोषण पर आवाज नहीं उठाया। आदिवासी मंत्री आदिवासी एक्सप्रेसा दौड़ाकर मुख्यमंत्री बनने का सपना तो देखते हैं मगर कभी अपने समुदाय की इस गंभीर समस्या को नहीं उठाया।

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