Chhattisgarh News: आदिवासियों के हित में विष्‍णु देव सरकार का बड़ा फैसला: देश में पहली बार छत्‍तीसगढ़ में लागू हो रही ऐसी व्‍यवस्‍था, जिसे दूसरे राज्‍य भी करेंगे फालो

Chhattisgarh News: आदिवासियों के हित में विष्‍णु देव सरकार का बड़ा फैसला: देश में पहली बार छत्‍तीसगढ़ में लागू हो रही ऐसी व्‍यवस्‍था, जिसे दूसरे राज्‍य भी करेंगे फालो

Chhattisgarh News: रायपुर। छत्‍तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए बड़ी खबर है। वन अधिकार के तहत हासिल जमीन का पट्टा अब उनके नाम पर दर्ज होगा। राज्‍य सरकार ने वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रधारकों की मृत्यु होने पर वारिसानों के नाम पर काबिज वन भूमि का हस्तांतरण राजस्व या वन अभिलेखों में दर्ज करने का फैसला किया है। इससे भविष्य में नक्शा का जिओ रिफ्रेंसिंग होने से भूखंड का आधार नंबर भी लिया जाएगा। इसका उपयोग नामांतरण, सीमांकन, बटवारा आदि में किया जाएगा।

मुख्‍यमंत्री विष्‍णु देव साय के इस फैसले से अब वन अधिकार वाली जमीनों पर खेती कर रहे आदिवासी किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्‍मान निधि सहित केंद्र और राज्‍य सरकार की विभिन्‍न योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। इतना ही नहीं ऐसे किसान अब धान सहित अपनी उपज कृषि उप मंडियों के जरिये बेच सकेंगे।

आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणी बोरा ने कहा कि मुख्‍यमंत्री विष्‍णुदेव साय और विभागीय मंत्री राम विचार नेताम के मार्गदर्शन वन अधिकार पट्टों के नामांतरण, सीमांकन, बटवारा और त्रुटि सुधार की व्‍यवस्‍था लागू करने के लिए विस्‍तृत व्‍यवस्‍था बनाई गई है। आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग नोडल विभाग है। विभाग की तरफ से राजस्‍व विभाग, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के साथ प्रभावि समन्‍वय किया गया है। सभी विभाग इस लागू करने के लिए बेहतर काम कर रहे हैं।

देश के लिए रोल मॉडल बनेगा छत्‍तीसगढ़

अफसरों के अनुसार यह अधिनियम देशभर में लागू है, लेकिन नामांतरण, सीमांकन, बटवारा आदि की व्‍यवस्‍था कहीं लागू नहीं है। इस तरह की व्‍यवस्‍था लागू करने वाला छत्‍तीसगढ़ देश का पहला राज्‍य है। यही वजह केंद्र सरकार ने इसकी डिटेल मांगी है, ताकि दूसरे राज्‍यों में भी इसे लागू किया जा सके।

लंबे इंतजार के बाद बनी व्‍यवस्‍था

अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 छत्तीसगढ़ राज्य में वर्ष 2008 से लागू है। इस अधिनियम का उद्देश्य वनों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों को काबिज पैतृक भूमि पर वन अधिकारों की मान्यता प्रदाय करना है, जिसमें काबिज भूमि के अधिभोग का अधिकार भी है, जिससे उनकी खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका को सुनिश्चित किया जा सके। इसके साथ ही स्थानीय समुदाय के माध्यम से वनों की सुरक्षा, संरक्षण एवं प्रबंधन को सुदृढ़ करते हुए पारिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखना भी इस अधिनियम का उद्देश्य है।

लगभग 10 हजार से ज्‍यादा प्रकरण

राज्य में कुल 4 लाख 81 हजार 324 व्यक्तिगत वन अधिकार 3 लाख 84 हजार 727 हेक्टेयर वन भूमि में वितरित किया जा चुका है, अब तक लगभग 9739 वन अधिकार पत्रधारकों की मृत्यु हो जाने के कारण उनके विधिक वारिसानो के नाम भूमि का हस्तांतरण किये जाने की आवश्यकता है।

जानिये…नियमों में कहां थी कमी

वन अधिकार अधिनियम, 2006 धारा 4 (1) अनुसार वन अधिकार पत्रधारकों की मृत्यु होने की दशा में उनके वंशजो / वारिसानों को वंशानुगत रुप से वन भूमि के हस्तांतरण के संबंध में उल्लेख है किन्तु मूल दावाकर्ता की मृत्यु होने पर उसे जारी वन अधिकार पत्र में संशोधन किये जाने के बारे में वन अधिकार अधिनियम / नियमों में कोई प्रावधान का उल्लेख नहीं है। वन अधिकार के पत्रधारक की मृत्यु होने पर उसके वारिसान को काबिज भूमि नामांतरित करने के संबंध में प्रक्रिया का उल्लेख वन अधिकार के नियमों में नहीं है। इससे हमारे पत्रधारकों को नामांतरण, सीमांकन, खाता विभाजन जैसे कार्यो में अत्यंत कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

छत्‍तीसगढ़ में बनी ऐसी व्‍यवस्‍था

नोडल विभाग आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा कार्यवाही करते हुए राजस्व एवं वन विभाग के सहयोग से फौती नामांतरण की प्रक्रिया को तैयार किया गया है, जिसके अनुसार व्यक्तिगत वन अधिकार प्राप्त पत्रधारकों की मृत्यु / फौत होने पर वारिसानों के नाम पर काबिज वन भूमि का नामांतरण एवं राजस्व एवं वन अभिलेखो में दर्ज करने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इसमें वन अधिकार पत्रधारक का निधन होने पर उनके विधिक वारिसानों के द्वारा काबिज वन भूमि, जिस विभाग के अभिलेखों में दर्ज है, उस विभाग यथा राजस्व विभाग हेतु तहसीलदार एवं वन विभाग हेतु रेंज आफिसर को घोषणा पत्र, वन अधिकार पत्रधारक का मृत्यु प्रमाण पत्र, वारिसानों का आधार कार्ड, मोबाईल नंबर / संपर्क नंबर के साथ आवेदन किया जावेगा।

जानिये.. कैसे होगा नामांकरण

फौती नामांतरण के संबंध में आवेदन पत्र प्राप्त होने पर राजस्व वन भूमि के मामले में तहसीलदार एवं वन विभाग की भूमि के मामले में रेंज आफिसर के द्वारा संबंधित भू-अभिलेख के कैफियत कॉलम में दर्ज प्रविष्टि में संशोधन किया जायेगा। नामांतरण के अतिरिक्त वन अधिकार मान्यता पत्रकधारी के जीवनकाल में उनके द्वारा प्रस्तावित या उसकी मृत्यु के उपरांत विधिक वारिसानों के मध्य खाता विभाजन के लिए प्रक्रिया अनुसार विधिक वारिसानों के मध्य वन अधिकार पत्र की वन भूमि के बंटवारे की कार्यवाही की जाएगी। सरकारी नक्शों में मान्य वन अधिकारों के सीमांकन की कार्यवाही की जाएगी। राजस्व/ वन विभाग के अभिलेखों में वन अधिकारों को अभिलिखित / दर्ज करने की कार्यवाही की जाएगी। अभिलेखों में वन अधिकार पत्रधारकों की गलत जानकारी दर्ज होने की स्थिति में वन विभाग के मामले में रेंज आफिसर एवं राजस्व विभाग के मामले में तहसीलदार कार्यवाही हेतु अधिकृत होंगे। हितबद्ध व्यक्ति / वारिसान द्वारा तहसीलदार के निर्णय के विरुद्ध अनुविभागीय अधिकारी (रा.) द्वारा तथा रेंज आफिसर के निर्णय के विरुद्ध उप वनमण्डलाधिकारी को अपील की जा सकेगी। निराकरण की समय-सीमा तीन माह होगी।

इस प्रक्रिया में राजस्व विभाग द्वारा भू-राजस्व संहिता की धारा 110, 115, 129 एवं 178 के प्रावधानों को भी ध्यान में रखा गया है, जबकि वन विभाग द्वारा ऐसा कोई प्रावधान पूर्व में नहीं होने के कारण नवीन रुप से प्रक्रिया निर्धारित की गई है। मंत्री परिषद के इस निर्णय से भविष्य में राज्य के लाखों व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रधारकों को और उनके वंशजों को नामांतरण के संबंध में हो रही कठिनाई दूर होगी एवं उनके नाम पर नामांतरण, खाता विभाजन, सीमांकन आदि में सुविधा होगी।

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