श्री शिव मन्दिर प्रबन्ध समिति धर्मपुर देहरादून के द्वारा महाशिवरात्रि पर्व पर 11 किलो चांदी का मुकुट चढ़ाया 

श्री शिव मन्दिर प्रबन्ध समिति धर्मपुर देहरादून के द्वारा महाशिवरात्रि पर्व पर 11 किलो चांदी का मुकुट चढ़ाया 

देहरादून–श्री शिव मन्दिर प्रबन्ध समिति धर्मपुर देहरादून के द्वारा महाशिवरात्रि पर्व पर 11 किलो चांदी का मुकुटजी हां कुछ ऐसी ही भावनाओं के साथ सिद्वपीठ प्राचीन श्री शिव मन्दिर धर्मपुर चौक की प्रबन्ध समिति निरन्तर कार्य कर रही है

फिर चाहे गरीब कन्याओं का विवाह हो, मेडि़कल केम्प, लिगल एडवाईजर केम्प, टीकाकरण, पौधे वितरण का कार्य हो, पालीथीन का उपयोग न हो इसके लिए थैलों के वितरण का कार्य हों, सफाई अभियान हो, नशे के खिलाफ अभियान हो, मन्दिर समिति हमेशा समाज हित मे लगी रहती है।

इसके साथ-साथ धर्म प्रचार, समाज में फैल रही अनेकों बुराईयों को दुर करने का प्रयत्न करती रहती है बच्चों में अपने माता पिता गुरूजन के प्रति आदर धर्म के प्रति रूचि बढे ऐसे संस्कार सिखाये जाते है।

प्राचीन शिव मन्दिर का इतिहास 300 वर्ष पुराना हैः- बताया जाता है मुगल साम्राज्य के अत्याचार से हिन्दू धर्म को बचाने हेतु कुछ लोग राजस्थान, गुजरात, से पलायन कर उत्तराखंड हिमालय की ओर आये, जिसमे अधिकतर लोग चमोली जिले मे बसे, कुछ समय बाद फिर कुछ लोग वापस लोटे, उनमे से कुछ महापुरूष बद्रीनाथ भगवान के दर्शन कर अलकनन्दा नदी से एक ज्योतिर्लिगं लेकर चले रास्ते मे जगह जगह विश्राम करते हुए देहरादून पहुंचे क्योंकि यात्रायें उस समय पैदल हुआ करती थी, बेड़े मे पुष्कर, नासिक, और चमोली जिले के लोग थे।

उस समय श्री गुरू राम राय जी ने सन् 1690 के दशक में देहरादून बसाया था जिसमें से कुछ शिष्य जो उनके साथ मेरठ, मुजफ्फर नगर, हरियाणा से आये थे वे धर्मपुर क्षेत्र मे बसे।सन 1720 के दशक में बद्रीनाथ से देहरादून आने पर उनका पहला पड़ाव धर्मपुर में पड़ा जहां कुछ आबादी थी यात्री यहां रूके ज्योतिर्लिंग भी साथ था यात्रा मे धर्मपुर क्षेत्र के भी कुछ लोग थे जिसके आग्रह पर यात्रियों ने ज्योतिर्लिंग यहां स्थापित कर दिया कुछ लोग यहीं बस गये कुछ चले गये, धर्मपुर क्षेत्र वासियां ने इस मन्दिर का जीर्णोधार करवाया, जिसमे चौधरी, लम्बरदार, धीमान, परिवारो का विशेष योगदान रहा। अनेक सन्तो ने यहॉ सिद्वि प्राप्त की जिसमे से एक सागर गीरि जी महाराज हुऐ जिन्होने बाद मे रिस्पना पुल स्थित अपनी कुटिया बनाई और समाधि ली, क्योकि ज्योतिर्लिंग यहॉ स्थापित करने वालो मे राजस्थान प्रान्त के पुष्कर, महाराष्ट्र प्रान्त के नासिक व उत्तराखंड प्रान्त के चमोली जिले के लोग थे।

पुष्कर मे ब्रह्मा जी चमोली मे भगवान पंचकेदार मे से एक रूद्रदेव भगवान नासिक मे स्वम् विष्णुभगवान, ब्रह्मा विष्णु रूद्रदेव के रूप मे बारह ज्योतिर्लिंगों मे से एक त्रयम्बकेश्वर नाम से स्थापित है, ज्योतिर्लिंग भगवान बद्री नारायण बद्रीनाथ जी की अलकनन्दा नदी से लाया गया इस प्रकार धर्मपुर क्षेत्रवासियों ने इस शिवलिंग का नाम त्रयम्बकेश्वर महादेव के नाम से रख दिया, समय समय पर नागराज शिवलिंग पर आकर दर्शन देकर वहीं विलुप्त हो जाते हैं। श्रावन मास मे विशेष पूजा अर्चना अनुष्ठान जप तप श्रधालुओं द्वारा कराया जाता है जिसका विशेष महत्व है ।

वर्तमान मे मन्दिर की देखरेख मन्दिर समिति द्वारा कि जा रही है । वर्ष भर अनेक धार्मिक आयोजन किये जाते है मन्दिर मे सत्संग भवन, यज्ञशाला, योग ध्यान केन्द्र, यात्रियों के रूकने के लिये धर्मशाला व उचित कमरों की व्यवस्था है, समिति द्वारा अनेक समाज सेवा के कार्य समय समय पर चलाये जाते है । इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर मन्दिर समिति द्वारा भगवान पशुपतिनाथ जी का स्वरूप, 11 किलो चांदी के मुकुट के रूप मे बनाया गया है जिसकी प्रातः काल प्रभात फेरी क्षेत्र मे निकाली गयी, व सॉंयकाल महाआरती व भव्य श्रृंगार की गया।मन्दिर मे जलाभिषेक रात्रि 12ः00 बजे से प्रारम्भ हो गया। दिनभर श्रधालुओ का तांता लगा रहा साथ ही कीर्तन भजन चलता रहा, जिस उपलक्ष्य मे 5 कुन्तल दूध से विशेष चरणामृत बनाया गया।

जिसमे प्रधान देवेन्द्र अग्रवाल, आत्माराम शर्मा, सीताराम भट्ट, मदन गोपाल हुरला, जयप्रकाश बंसल, चतरदास हुरला, दीपक शर्मा, रामदास जयसवाल, प्रमोद शर्मा, तथा तीनो कीर्तन मण्डली सम्मिलत रहीं।

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